आधुनिकता: शोध-क्षेत्र में व्याप्त आत्मविस्मृति एवं आत्मसंभ्रम

राकेश मिश्र

Abstract


आधुनिकता मनुष्य को स्वयंभू ;ैमस.िहतवनदकमकद्ध मानती है। इसके अनुसार मनुष्य इन्द्रियजन्य अनुभव
एवं बुद्धिबल के संयोग से सृष्टि के सभी रहस्यों का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम है, और मानव इतिहास
इसी दिशा में गतिमान है। आधुनिक विचार दृष्टि मनुष्य की सर्वज्ञता की प्रतिपादक रही है। आधुनिक
ज्ञान-विज्ञान यह मानता है कि मनुष्य अनुभव, प्रयोग और तर्क-शक्ति के बल पर प्रकृति व समाज
के सभी पक्षों को प्रकाशित कर सकता है और इस प्रकार अभूतपूर्व भौतिक-आर्थिक उपलब्धियाँ हासिल
कर सकता है। आधुनिक ज्ञान-मीमांसा में ऋतम्भरा-प्रज्ञा व आत्मानुभूति के लिए कोई स्थान नहीं है।
आधुनिक विचार-दृष्टि व्यक्ति, समाज एवं ब्रह्माण्ड को यंत्र के रूप में देखती है। उसके लिए व्यक्ति
कुछ रासायनिक-जैविक क्रियाओं व इच्छाओं, भावनाओं एवं तर्क बुद्धि का योग ;।हहतमहंजमद्ध है; समाज
व्यक्तियों व उनके द्वारा गढ़ी गई संस्थाओं का योग एवं ब्रह्माण्ड परमाणुओं व उनमें निहित ऊर्जा को
योग है। इस विचार दृष्टि में किसी साकल्यवादी एवं सावयविक परिप्रेक्ष्य का अभाव है। व्यक्ति को
स्व-पर्याप्त, पृथक एवं असम्बद्ध प्राणी मानने के फलस्वरूप सामाजिक संस्थाओं व सम्बन्धों को पवित्रता
की दृष्टि से नहीं, वरन् उपयोगिता की दृष्टि से देखा जाता है। आधुनिकता का उदय तो यूरोप में हुआ
परन्तु यूरोपीय साम्राज्यवाद के साथ यह विश्व के कोने कोने में पहुँची। आधुनिकता का उदय वैसे
तो ईसाई धर्म-परम्परा के विरुद्ध हुआ पर वस्तुतः वह हर धर्म व परम्परा की विघातक है। आधुनिकता
यदि प्रकट रूप से नहीं तो प्रच्छन्न रूप से नास्तिकता की पोषक है। यह विडम्बना ही है कि ज्ञानियों
एवं मनीषियों की भूमि भारत आज आत्म-विस्मरण एवं संभ्रम की स्थिति में है। कई शताब्दियों के
विजातीय शासन ने भारत के समान्य एवं विशिष्ट जनों को जो आधुनिक विचार-दृष्टि दी उसने
कुविचारों और कुचेष्टाओं को ही स्थापित किया है। आज भारतीय शिक्षा-जगत को आत्म-मंथन की
बड़ी आवश्यकता है। शिक्षा और शोध के लक्ष्य का निर्धारण भारतीय विचार-दृष्टि के अनुरूप होना
चाहिए। भारत के शोधकर्ताओं को आधुनिक पाश्चात्य च्ंतंकपहउ और च्ंतंउमजमत से मुक्त होने की
आवश्यकता है, क्योंकि इनकी उपादेयता एवं सार्थकता पश्चिमी जगत में ही संदिग्ध घोषित की जा
चुकी है।

Keywords


पुनर्जागरण, मानववाद, नामवाद, व्यक्तिवाद, इहलोकवाद, बुद्धिवाद, साकल्यवाद, प्रत्यक्षवाद, अनुबन्धवाद, सापेक्षतावाद, प्रतिवर्ती, विशेषीकरण, पद्धति

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DOI: https://doi.org/10.29320/jnpgvr.v10i01.11050

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