भारत में न्यायपालिका की भूमिका: न्यायिक सक्रियता के सन्दर्भ में

ओ.पी. बी. शुक्ला

Abstract


संविधान द्वारा भारत में स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना की गयी है। जिसका कार्य अपने समक्ष आने
वाले वादों का निष्पक्षता पूर्वक निपटारा करना है। प्रारंभिक वर्षों में न्यायपालिका संविधान द्वारा प्रदत्त
अपने उत्तरदायित्वों का सम्यक् निर्वहन कर रही थी लेकिन बाद में हालात कुछ ऐसे बने कि शासन के
अन्य दोनों अंग विधायिका और कार्यपालिका अपने दायित्वों को पूरा करने में असमर्थ दिखाई देने लगे।
उनमें संविधान के आदर्शों के प्रति गम्भीरता और जनहित के प्रति संवेदनशीलता का अभाव प्रतीत हुआ
ऐसे में न्यायपालिका, जो पारम्परिक मूल्यों और मानकों का अनुपालन करते हुए अभी तक मूकदर्शक
थी, विधि के शासन को सुरक्षित रखने के लिए उठ खड़ी हुई। न्यायपालिका ने जन संवेदनशीलता
का परिचय देते हुए कुछ सामाजिक और कल्याणकारी कार्यों को अंजाम दिया जिसको ‘‘न्यायपालिका
की सक्रियता’’ नाम दिया गया है। न्यायिक सक्रियता का आधार सांविधानिक है जिसे न्यायपालिका
ने संविधान की व्याख्या करते हुए समय-समय पर स्पष्ट किया है।

Keywords


प्रीवी कौंसिल, न्यायिक सक्रियता,, सांविधानिक, संवेदनशीलता, जनहित, विवाद, पवित्र पंचभुज, कल्याणकारी।

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DOI: https://doi.org/10.29320/jnpgvr.v10i01.11051

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