भारतीय मजदूर संघ एवं अन्य श्रमिक संघ

गोपाल कृष्ण चतुर्वेदी

Abstract


वर्तमान लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली में श्रमिक संघों का दबाव समूह के रूप में महत्वपूर्ण स्थान
है। औद्योगीकरण ने श्रमिकों के जीवन एवं कार्यदशाओं के लिए विपरीत परिस्थितियां पैदा कर दी और
श्रमिक सिर्फ शोषण का पर्याय बन गये। इसी शोषण से अपनी आजादी के लिए तथा पीड़ादायक व
असहनीय कार्यदशाओं को बदलने के लिए विश्व के विभिन्न देशों में कार्ल माक्र्स के अनुयायियों की
संख्या बढ़ी और श्रमिकों ने आपस में एकत्र होकर श्रमिक संघों की स्थापना की शुरूआत की।
भारत भी इस वैश्विक घटनाक्रम से अछूता नहीं रहा। भारत में भी औद्योगीकरण के फलस्वरूप श्रमिक
संघों तथा श्रमिक आंदोलनों का जन्म हुआ, परन्तु संगठित रूप में भारत में श्रमिक संघों का गठन प्रथम
विश्व युद्ध (1914-1918) के बाद हुआ। प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति तक गठित श्रमिक संघों का मूल
उद्देश्य श्रमिकों की सेवा करना तथा उनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करना था। ये समाज
सेवियों द्वारा संचालित थे तथा इनका कोई अपना संगठन या संस्था नहीं थी।
विश्व स्तर पर र्काइे श्रमिक सगं ठन न होने क े कारण सन ् 1919 में अन्तराषर्् ट्रीय श्रम संगठन (आइर्0 एल0आ0े )
की स्थापना की गयी। अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा आयोजित की जाने वाली सभाओं में श्रमिक
प्रतिनिधियों को भेजने की व्यवस्था करने एवं देश के विभिन्न श्रमिक संघों को संगठित करके राष्ट्रीय
मंच प्रदान करने के लिए 31 अक्टूबर, 1920 में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में ट्रेड यूनियनों का
प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन मुम्बई में आयोजित किया गया। इसी सम्मेलन में आॅल इण्डिया ट्रेड यूनियन
कांग्रेस (एटक) की स्थापना की गयी। स्थापना के बाद एटक नेताओं का साम्यवादी मोह, पारस्परिक
प्रतिद्वन्द्विता व सैद्धांतिक/वैचारिक मतभेद के कारण सन् 1947 में इण्डियन नेशनल टेªड यूनियन कांग्रेस
(इण्टक) की स्थापना हुई। इण्टक शुरू से कांग्रेस की नीतियों एवं नेताओं के प्रभाव के दायरे में रही
और आज भी उससे मुक्त नहीं है। इण्टक में ही उसकी नीतियों एवं नेताओं से असहमत कुछ
समाजवादी नेताओं ने कलकत्ता (वर्तमान, कोलकाता) में समाजवादी विचारधारा वाली हिन्द मजदूर सभा
का गठन किया।
श्रमिक संगठनों के गठन की प्रक्रिया यहीं नहीं रूकी। 1949 में फारवर्ड ब्लाक और रिवोल्यूशनरी पार्टी
के नेतृत्व में ‘यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस (यूटक) की स्थापना हुई। 23 जुलाई 1955 में राष्ट्रीय
स्वयं सेवक संघ के प्रचारक श्री दत्तोपंत ठेगड़ी ने श्रमिकों का शोषण रोकने तथा उनके अधिकारों की
रक्षा करने के लिए भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की।
सन् 1964 में साम्यवादी दल में विभाजन के कारण भारत में कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) का गठन हुआ।
इस विभाजन का प्रभाव भारत के सबसे प्राचीन श्रमिक संघ एटक पर पड़ा और उससे अलग होकर सन्
1970 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) ने सेंटर आॅफ इण्डियन ट्रेड यूनियन (सीटू) के रूप में
एक नये श्रमिक संघ का गठन किया।

Keywords


मजदूर संघ, औद्योगिकीकरण, श्रमिक संगठन, राष्ट्रवाद

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DOI: https://doi.org/10.29320/jnpgvr.v10i01.11052

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