सामाजिक न्याय एवं राजनीतिक दल: एक मूल्यांकन

कुलवीर सिंह चैहान

Abstract


न्याय का परम्परागत दृष्टिकोण जहां व्यक्ति के चरित्र से सम्बन्ध रखता है वहीं आधुनिक दृष्टिकोण
का मुख्य जोर मानव की भौतिक, आर्थिक उन्नति के सामाजिक पक्ष पर है। न्याय के इस आधुनिक
दृष्टिकोण को ही ‘सामाजिक न्याय’ के रूप में जाना जाता है। सामाजिक न्याय की धारणा प्रमुख रूप
से 19वीं शताब्दी में न्याय के परम्परागत आदर्श की प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट हुई। सामाजिक न्याय
मांग करता है कि धन एवं विशेषाधिकार से उत्पन्न असमानता को दूर किया जाए। धन, धर्म, जाति,
लिंग व जन्म स्थान आदि के आधार पर किसी भी व्यक्ति के साथ न तो विभेद किया जाए, न किसी
को विशेष सुविधाएं दी जाएं। वस्तुतः सामाजिक न्याय का मुख्य उद्देश्य मानव द्वारा मानव का शोषण
समाप्त करना है, प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे अवसर मुहैया कराना है जिनसे वह अपनी योग्यताओं का
अधिकतम विकास कर सके। वर्तमान विश्व में सामाजिक न्याय की अवधारणा का महत्व विकसित देशों
की अपेक्षा विकासशील देशों की शासन प्रणालियों में अधिक प्रासंगिक है। तृतीय विश्व के देशों में
विदेशी दासता से मुक्ति हेतु जो संघर्ष हुए उनके पीछे सामाजिक न्याय प्राप्ति की स्वाभाविक इच्छा
एक प्रमुख कारण रहे हैं। इन्हीं जन आकांक्षाओं और उनको पूर्ण करने के हेतु एक वाहक के रूप
में नवस्वतंत्र देशों में राजनीतिक दलों का निर्माण हुआ। वर्तमान विश्व में अधिकांश देशों में उदारवादी
लोकतांत्रिक राजनैतिक व्यवस्थाएं सामाजिक न्याय के लक्ष्य को लेकर शासन में हैं। इन शासन
व्यवस्थाओं में राजनीतिक दल सरकार के कार्यपालिका एवं व्यवस्थापिका अंगों के मध्य एक समन्वय
का कार्य करते हैं। दलों का होना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। राजनैतिक दलों के अभाव में
व्यवस्थापिका कुछ लोगों की भीड़ बनकर रह सकती है। विभिन्न जनतंत्रीय देशों में दल प्रणाली का
स्वरूप सम्बन्धित देशों के राजनीतिक इतिहास और सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों की देन
होता है यही कारण है कि विभिन्न जनतंत्रीय देशों में दल प्रणाली का स्वरूप भी भिन्न-भिन्न है। आज
विभिन्न जनतांत्रिक प्रतिनिधि शासन व्यवस्थाओं में राजनीतिक दल, शासन को दृढ़ता प्रदान करने,
राष्ट्रीय एकता की प्राप्ति, सरकार के निर्माण एवं नियंत्रण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर
रहे हैं। सामाजिक न्याय की उपरोक्त मान्यताओं के विपरीत प्लेटो जैसे परम्परावादी चिन्तक का न्याय
वर्ग विशेषीकरण पर आधारित है। न्याय के इस संदर्भ को भारतीय संस्कृति में व्यक्ति की आजीविका
और समाज के आर्थिक विकास को पुरूषार्थ चतुष्टय के विराट संदर्भ में हल किया गया है। जिसमें
स्वधर्म का भाव आर्थिक सम्पन्नता, सामाजिक सामंजस्य और आत्मिक परितोष का संवर्धक है। यह
जीवन को कला में परिणत करने का माध्यम है, व्यष्टि में समष्टि का अवतरण, और समष्टि में विराट
का आविर्भाव है। यदि न्याय के मूलभूत सिद्धान्तों की समझ वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में बैठे दलों
में लानी है जो कि इसके आवश्यक अंग हैं, तो सबसे पहले उन्हें भारत के प्राचीन सामाजिक राजनैतिक
एवं आर्थिक स्वरूप को समझना होगा। परम्परागत भारतीय जीवन मूल्यों में आस्था रखते हुए पश्चिम
के उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सीमाओं को समझकर नीतियों का निर्माण करना होगा। दलों
को राजनीतिक सत्ता को शासन सुख के बजाय लोकमंगल के परम्लक्ष्य तक लाना होगा। सच्चे अर्थों
में तभी न्याय की स्थापना हो पायेगी जो सामाजिक न्याय के वर्तमान लौकिक लक्ष्यों से परे मानव को
आत्म उन्नति के सर्वोच्च लक्ष्य की ओर ले जायेगी।

Keywords


सामाजिक न्याय, सामाजिक सरोकार, असमानता, व्यष्टि, समष्टि, राजनीतिक दल, समावेशीय विकास, अल्पसंख्यक, विषमता, पहचान, सामाजिक सुरक्षा, संतुलित विकास, सूचकांक, राजनीतिकरण

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DOI: https://doi.org/10.29320/jnpgvr.v10i01.11053

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