जलवायु परिवर्तन और विश्व समुदाय

विजय कुमार

Abstract


जलवायु परिवर्तन विश्व समुदाय की सबसे ज्वलन्त समस्या है, जो मानव द्वारा पृथ्वी पर स्वयं को
सम्पोषित ;ैनतअपअमद्ध करने से सम्बन्धित है। बढ़ती औद्योगिक गतिविधियाँ, नगरीकरण, आधुनिक
रहन-सहन, धुँआ उगलती चिमनियाँ, निरन्तर सड़कों पर बढ़ते वाहनों एवं ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव
से पृथ्वी का तापमान पूर्व-औद्योगिक अवस्था से लेकर आज तक निरन्तर बढ़ता जा रहा है। यह स्थिति
ग्लोबल वार्मिंग कही जाती है। बहुतायत देश अपनी ऊर्जा की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जीवाश्म
ईंधनों पर निर्भर हैं। इन जीवाश्म ईंधनों के निरन्तर प्रयोग से ओजोन परत को क्षरित करने वाली गैसें
उत्पन्न हो रही हैं। ओजोन परत के क्षरण एवं ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने हेतु वियना,
मान्ट्रियल, पेरिस और किगाली आदि समझौते हुए। इन समझौतों में दुनिया के देशों ने मिलकर तापमान
वृद्धि को बढ़ाने में योगदान देने वाली गैसों जैसे-ब्व्2ए मीथेन, क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन इत्यादि गैसों को
कम करने की समय सीमा तय की गयी। सभी देशों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि नवीनीकरण
ऊर्जा, संपोषित नगरीय यातायात, वन तथा जलवायु के क्षेत्र में संपोषित नियंत्रण स्थापित किया जायेगा।
इसके लिए यू.एन.एफ.सी.सी.सी. के अनुच्छेद-11 में विकासशील देशों को धन देने की भी बात की
गयी है। वैश्विक तापमान वृद्धि से हिमनद पिघल रहे हैं, महासागरों का जल अम्लीय हो रहा है। इन
सब कारणों से मानवता खतरे में पड़ गयी है।

Keywords


जलवायु परिवर्तन, ग्रीन हाउस गैस, ग्लोबल वार्मिंग, जीवाश्म ईंधन, नवीनीकरण ऊर्जा, ओजोन परत।

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DOI: https://doi.org/10.29320/jnpgvr.v10i01.11056

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