भारतीय परम्परा के जीवन मूल्य

आलोक भारद्वाज

Abstract


मानव मस्तिष्क स्वभावतया मूल्य शोधक है। मानव समाज ने सभ्यता और संस्कृति के क्षेत्र में जो प्रगति
की है उसकी आधारशिला भी मानव मूल्य ही हैं। मूल्यों का अन्वेषण करना युग विशेष का कार्य नहीं
है। यह एक अनवरत् चलने वाली प्रक्रिया है। मूल्य ही संस्कृति को वैशिष्ट्य प्रदान करते हैं।
भारतीय दर्शन के विकास के प्रथम सोपान से ही भारतीय मूल्य परम्परा का बीज रूप हमंे प्राप्त होना
शुरू हो जाता है। मूल्य-सम्बन्धी चिन्तन के सूत्र हमें वैदिक साहित्य से ही मिलने शुरू हो जाते
है।ऋग्वैदिक मूल्यों में ऋत के विचार का अत्यधिक महत्व है। ऋत हमारे आगे सदाचार के एक
मानदण्ड को प्रस्तुत करता है। संहिता काल में धार्मिक भावना प्रधान थी, परन्तु ब्राह्मण काल में कर्मकाण्ड
को अधिक महत्व दिया जाने लगा। उपनिषद्-काल में कर्मकाण्ड की अपेक्षा ज्ञान को अधिक महत्वपूर्ण
माना गया। जीवन के आभ्यंतर पक्ष को विकसित और विस्तृत करने का आह्वान इन उपनिषदों की
अन्यतम विशेषता है। महाकाव्यों के काल की जनता आध्यात्मिक एवं आधिभौतिक समस्याओं के साथ
संघर्षरत दीखती है।
वर्णाश्रम व्यवस्था, पुरूषार्थ, संस्कार, ऋणत्रय, पंचमहायज्ञ आदि को प्राचीन भारतीय व्यवस्थाकारों ने
सामान्य मानव के जीवन से जोड़ कर अपने उदात्त मूल्य बोध का ही परिचय दिया है। भारतीय चिन्तकों
ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनुष्य के उत्थान के लिये एक अनुकरणीय पाथेय दिया जो उसके तथा समाज
के समग्र विकास के लिये आदर्श था।

Keywords


संहिता, ऋत, उपनिषद, पुरूषार्थ, संस्कार, ऋणत्रय, पंचमहायज्ञ, ंचकोष, सिद्धान्त

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DOI: https://doi.org/10.29320/jnpgvr.v10i01.11057

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