साहित्य, अभिलेख तथा पुरातत्त्व में स्तूप: पिपरहवा के विशेष सन्दर्भ में

विनय कुमार शर्मा

Abstract


छठी शताब्दी ईसापूर्व धर्मिक क्रान्ति का युग था। भगवान बुद्ध ने प्राणियों के दुखों को दूर करने के
लिये तपस्या के माध्यम से सम्बोधि प्राप्त करके प्राणियों को प्रज्ञा और करुणा का उपदेश दिया। 80
वर्ष की अवस्था में गौतम बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद उनके अस्थि अवशेषों का विभाजन जिन तत्कालीन
राजाओं के मध्य हुआ। इन अस्थि अवशेषों पर आठ स्तूप निर्मित हुए, जिनमें से शाक्यों द्वारा निर्मित
स्तूप पिपरहवा में है।

Keywords


स्तूप, बुद्व, पिपराहवा, अभिलेख

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DOI: https://doi.org/10.29320/jnpgvr.v10i01.11058

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