गुप्तकालीन समाज में ललित कलाओं में दक्ष नारी

गरिमा मिश्रा

Abstract


कला शब्द की व्युत्पत्ति की दृष्टि से आनन्द विधायनी प्रक्रिया का सूचक है। स्थूल कला दो प्रकार की
मानी गयी है - ललित एवं यांत्रिक कला। वैदिक साहित्य में इन दोनों प्रकार की कलाओं के लिये
शिल्प शब्द का प्रयोग हुआ है। कौशीतकि ब्राह्मण में नृत्य, गीत तथा वाद्य को शिल्प की संज्ञा दी गयी
है। शतपथ ब्राह्मण में शिल्प को प्रतिरूपतामक कहा गया है। महाभारत में शिल्पजीवी का उल्लेख
मिलता है। रामायण में राम को व्यवहारिक शिल्पों का ज्ञाता कहा गया है। व्यवहारिक शिल्पों का तात्पर्य
संगीत, कला, चित्रकला आदि से है, जो मनोरंजन के काम में आती थी। महाभारत में युधिष्ठिर की
दासियों को 64 कलाओं में निपुण बताया गया है। पाणिनि के अनुसार नर्तक, गायक, वादक जिस
ललित कला की साधना करते हैं उसे शिल्प कहा है। गुप्तकालीन समाज की नारियाँ संगीत, नाट्य
तथा चित्रकला जैसी ललित कलाओं में विशेष रूप दक्ष थीं।

Keywords


नारियाँ, कला, संगीत, चित्रकला

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DOI: https://doi.org/10.29320/jnpgvr.v10i01.11059

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