संस्कारों का मनोवैज्ञानिक विवेचन

क्षमा मिश्रा

Abstract


संस्कारो की समप्टि चरित्र की नियमात्मिका है, चरित्र ही जीवन की आधारशिला है। प्रशिक्षण संस्कार
अवचेतन रूप से अंदर ही अंदर हमारे चित्त का निर्माण करते हैं, निरंतर अच्छे विचार व सत्कार्यों में
संलग्न व्यक्ति अच्छा प्रभाव ग्रहण करता है। भारतीय संस्कृति में मानव को आदर्श व उन्नत रूप प्रदान
करने के जो साधन बताये गए हैं, उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है ’संस्कार’। भारतीय संस्कृति में मानव
का संस्कारों से अटूट सम्बन्ध रहा है। सूक्ष्म विवेचन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कारों
का विज्ञान व मनोविज्ञान से गहरा सम्बन्ध है। प्रायः सभी संस्कारों के पीछे कोई न कोई मनोवैज्ञानिक
तर्क या वैज्ञानिक कारण कार्य करता है। संस्कार मात्र सामाजिक व धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, प्रत्युत
विज्ञान एवं मनोविज्ञान की दृप्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संस्कारों का मनोवैज्ञानिक विश्लेष्ण उनके
एक नवीन अन्योन्याश्रित संबंध की व्याख्या करता है। इस आलोक में एक अभिनव दृप्टि विकसित होती
है। प्रस्तुत शोध पत्र में प्राचीन एवं आधुनिक मनोविश्लेषणकर्ताओं के सिद्धान्तों के आधार पर संस्कारों
के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध की नयी दृष्टि से व्याख्या का एक सूक्ष्म प्रयास किया गया है। कुछ संस्कारों
के मूल में सशक्त वैज्ञानिक मत प्रभावी हैं, जिन्हें जानकर हम संस्कारों की महत्ता को और भी अधिक
गंभीरता से जान सकते हैं और यह सिद्ध कर सकते हैं कि हमारे शास्त्रोक्त संस्कार विज्ञान, मनोविज्ञान
किसी भी कसौटी पर आज भी उतने ही खरे हैं जितने प्राचीन काल में थे।

Keywords


संस्कार, इदम्, अहम्, पराहम, चेतन, अद्धचेतन, अचेतन।

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DOI: https://doi.org/10.29320/jnpgvr.v10i01.11062

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