वर्तमान समय में मैथिलीशरण गुप्त के काव्य की प्रासंगिकता

नमिता दीक्षित

Abstract


जिनके काव्य में प्राचीन के प्रति पूज्य भाव और नवीन के प्रति उत्साह दोनों का मणिकांचन संयोग है ऐसे
गुप्त जी के अन्दर कालानुसरण की विशेष क्षमता थी । उन्होंने अपने काव्य में मानव जीवन की विभिन्न
अवस्थाओं का जीवन्त चित्रण प्रस्तुत किया है। सामाजिकता, राष्ट्र प्रेम की भावना, मर्यादावादिता, कत्र्तव्य
परायणता, नारियो के उत्थान की भावना इत्यादि का पूर्ण समावेश उनके सम्पूर्ण काव्य में मिलता है। यही
वो तत्व हैं जिनके कारण गुप्त जी के काव्य की प्रासंगिकता वर्तमान समय में यथावत बनी हुई है। उन्हांेने
अपनी प्रत्येक रचना को मानव जीवन के हितार्थ प्रस्तुत किया तथा अपने काव्य में ईश्वर की मानवता नहीं
बल्कि मानव की ईश्वरता दिखाने का प्रयास किया, वहीं उनके काव्य में सर्वत्र ‘गीता’ के कर्म दर्शन का
पूर्ण परिपाक मिलता है। लोकमंगल की भावना द्वारा उन्होंने विश्वबन्धुत्व की कामना की। अतः सर्र्वे भवन्तु
सुखिनः की इच्छा लिये हुये गुप्त जी का सम्पूर्ण काव्य वर्तमान समय के अंधकार को चीरने के लिये सूर्य
की भांति देदीप्यमान हो रहा है। साहित्य चाहे किसी भी समय का हो यदि उसमें सामाजिक कल्याण की
भावना निहित रहती है तो वर्तमान ही क्या प्रत्येक युग में ऐसे साहित्य की प्रासंगिकता बनी रहती है।

Keywords


राष्ट्रीयता, मानवतावाद, कत्र्तव्यपरायणता, नारी उत्थान, पारिवारिक प्रेम

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DOI: https://doi.org/10.29320/vichar.11.2.6

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