काव्यशास्त्र में गुण-विवेचनः भारतीय आचार्यो की दृष्टि में

अंजुला सक्सेना

Abstract


अन्य भारतीय चिन्तन धारओं के सदृश ही काव्य का भी वैज्ञानिक अध्ययन उसी दिन से प्रारम्भ हुआ जिस
दिन से मानव ने कवि का रूप प्राप्त किया, परिणामतः काव्यशास्त्र का प्रादुर्भाव हुआ। वस्तुतः काव्य का
प्रमुख प्रयोजन प्रवृत्ति-निवृत्ति नहीं अपितु “सद्यः परनिर्वृतये“ (काव्यप्रकाश-प्रथमउल्लास-श्लोक-2) या
रसास्वादन है। जिस प्रकार आत्मा-शरीर का जीवन धायक तत्व है, उसी प्रकार रस काव्य का
जीवनधायक तत्व है। जैसे मनुष्य के शरीर में चेतन आत्मा को उस (आत्मा) में रहने वाले वीरता आदि
गुण उत्कृष्ट करते हैं ठीक वैसे ही काव्यरूपी शरीर के प्राणभूत रस को उस (रस) में रहने वाले माधुर्य
आदि ‘गुण’ उत्कृष्ट करते हंै।
रस सिद्धान्त के प्रतिष्ठापक आचार्य भरतमनि से लेकर क्रमशः सभी भारतीय आचार्यो ने ‘काव्य में गुण’
की स्थिति तथा संख्या पर अपने-अपने दृष्टिकोण से विचार किए है। भरतमुनि की दृष्टि में दोषों का
विपर्यय ही ‘गुण’ है। प्रथम अलंकारशास्त्री भामह के अनुसार ‘गुण’ कात्य के प्रमुख एवं अपरिहार्य अंग हंै।
आचार्य दण्डी ‘गुण’ को कात्य के शोभा विधायक धर्म मानते हंै। महनीय आचार्य वामन के मतानुसार शब्द
तथा अर्थ के धर्म जो कात्य की शोभा को उत्पन्न करने हैं वे ही ‘गुण’ कहलाते हंै। अलंकार सम्प्रदाय के
अनुयायी आचार्य रूद्रट ने भी अनुसरण करते हुए छः गुणों का उल्लेख किया है। ध्वनिकार आनन्दवर्धन
की दृष्टि में ‘गुण’ आत्मभूत रस के धर्म हंै, शरीरभूत शब्दार्थ के नहीं। काव्य प्रकारान्तर आचार्य मम्मट
स्पष्ट रूप से कहते हैं ‘गुण’ रस के धर्म हैं, वे अचलास्थिति अर्थात् नित्य है, वे रसोत्कर्ष कारक हैं
विश्वनाथ आदि परवर्ती आचार्यो ने भी प्रकारान्तर से प्रायः इसी लक्षण को दोहराया है। भोज ने अपने गथ््रं ा
सरस्वती कण्ठाभरण में ‘गुण’ काव्य के अभ्यन्तर गुण हैं, यह कहते हुए गुणों का वर्णन किया है।
अग्निपुराण काव्य में कान्ति के आधायक धर्म को ही ‘गुण’ मानता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से ‘गुण’ तथा ‘रस’ दोनों ही व्यक्ति की मनःस्थितियाँ हैं। रस व्यक्ति की वह
आनन्दरूपी मनःस्थिति है जिसमें उसकी वृत्तियाँ अन्वित हो जाती हैं, यह स्थिति अखण्ड है। उसी प्रकार
‘गुण’ भी एक तरह की मनःस्थिति ही है, जिसमें कहीं चित्तवृत्तियाँ द्रवित होती हैं तो कहीं दीप्त कहीं
परिव्याप्त। भारतीय आचार्यो ने गुणों की संख्या पर भी अपनी-अपनी दृष्टि से विचार किया किसी ने दस
तथा किसी ने छः गुणों की कल्पना की परन्तु काव्यास्वादन की दशा में अंततः चित्त की स्थितियों द्रुति,
दीप्ति तथा व्यापकत्व के आधार पर तीन ‘गुण’ ही स्वीकृत किए गए। ‘माधुर्य’ चित्त की द्रवित अवस्था
है, ‘ओज’ दीप्त तथा ‘प्रसाद’ व्यापक।

Keywords


काव्य गुण, काव्य लक्षण, रस, साधारणीकरण, आधायक धर्म

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DOI: https://doi.org/10.29320/vichar.11.2.8

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